Love Jihad: कानून से पहले परिवार की भूमिका अहम, संघ प्रमुख ने बताया क्यों जरूरी है ‘संवाद’

January 28, 2026 6:02 PM


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने ‘लव जिहाद’ को रोकने के लिए परिवारों के भीतर आपसी संवाद और बेटियों को सक्षम बनाने को सबसे बड़ा हथियार बताया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुरक्षा के नाम पर महिलाओं को घरों में कैद रखने का समय अब बीत चुका है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शनिवार को ‘लव जिहाद’ जैसे मुद्दों पर एक नई दिशा देते हुए इसका समाधान परिवार और समाज के भीतर खोजने की बात कही।

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‘स्त्री शक्ति संवाद’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि इस समस्या को रोकने की शुरुआत घर से ही होनी चाहिए। उनका स्पष्ट मानना है कि अगर परिवार में खुला संवाद होगा, तो कोई भी बाहरी व्यक्ति सेंध नहीं लगा पाएगा।

तीन स्तरों पर सुरक्षा चक्र

मोहन भागवत ने परिवारों को आत्ममंथन करने की सलाह दी है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर एक परिवार की लड़की किसी अजनबी के प्रभाव में कैसे आ जाती है? इसका सीधा कारण उन्होंने परिवारों में संवाद की कमी (Lack of Communication) को बताया।

इस चुनौती से निपटने के लिए उन्होंने तीन स्तरों पर काम करने का सुझाव दिया। पहला- परिवार के भीतर लगातार बातचीत होती रहे। दूसरा- लड़कियों को जागरूक किया जाए और उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए शारीरिक व मानसिक रूप से सक्षम बनाया जाए। तीसरा- ऐसे अपराध करने वालों के खिलाफ समाज और कानून मिलकर प्रभावी कार्रवाई करें। भागवत ने कहा कि सामाजिक संगठनों को सतर्क रहकर सामूहिक प्रतिक्रिया देनी होगी।

सुरक्षा के नाम पर बंदिशें अब नहीं चलेंगी

महिलाओं की सामाजिक भूमिका पर बात करते हुए संघ प्रमुख ने एक महत्वपूर्ण लकीर खींची। उन्होंने कहा कि वह समय अब इतिहास बन चुका है, जब सुरक्षा का हवाला देकर महिलाओं को घरों तक सीमित रखा जाता था। आज धर्म, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था महिलाओं के कारण ही सुरक्षित है।

भागवत ने कहा कि समाज को आगे ले जाने के लिए पुरुषों और महिलाओं, दोनों का ‘प्रबोधन’ (Enlightenment) आवश्यक है। महिलाओं का सशक्तीकरण और सार्वजनिक जीवन में उनकी सक्रिय भागीदारी ही आज की जरूरत है।

परिवार में कोई अकेला न महसूस करे

कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक ढांचे पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि परिवार में संतुलन और संवेदनशीलता बनाए रखने में महिलाएं केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि घर का कोई भी सदस्य खुद को अकेला महसूस न करे।

बच्चों की परवरिश पर सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि उन पर वास्तविकता से परे उम्मीदें नहीं थोपी जानी चाहिए। जीवन का अर्थ सफलता से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत अब ‘मानसिक गुलामी’ से बाहर निकल रहा है और पूरी दुनिया उम्मीद भरी नजरों से देश की ओर देख रही है। इस मौके पर संघ के मध्य भारत प्रांत के पदाधिकारी अशोक पांडे और सोमकांत उमलाकर भी मंच पर उपस्थित रहे।

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