उत्तराखंड में भूस्खलन अब केवल मौसमी घटना नहीं रह गया है, बल्कि यह एक गंभीर भू-वैज्ञानिक और जलवायु संकट का संकेत बनता जा रहा है। देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान द्वारा किए गए व्यापक अध्ययन में सामने आया है कि बीते डेढ़ सौ वर्षों में दर्ज जानलेवा भूस्खलनों का बड़ा हिस्सा हाल के दो दशकों में हुआ है।
संस्थान ने वर्ष 1868 से 2023 के बीच राज्य में हुए 64 घातक भूस्खलनों का विश्लेषण किया। इन घटनाओं में 1516 लोगों की जान गई। रिपोर्ट बताती है कि करीब 67 प्रतिशत जानलेवा घटनाएं वर्ष 2000 के बाद दर्ज की गईं। यही नहीं, अत्यधिक वर्षा की 84 प्रतिशत घटनाएं भी इसी अवधि में सामने आईं, जो मौसम के बदलते स्वरूप की ओर इशारा करती हैं।
अध्ययन के अनुसार अधिकांश गंभीर भूस्खलन भूकंपीय दृष्टि से सक्रिय मेन सेंट्रल थ्रस्ट क्षेत्र के आसपास हुए हैं। यह हिमालय की एक प्रमुख संरचनात्मक दरार है, जहां छोटे-छोटे भूकंप लगातार चट्टानों की आंतरिक मजबूती को प्रभावित करते रहते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जब लगातार दो से तीन दिनों तक भारी बारिश होती है, तो पानी चट्टानों की दरारों में समाकर उन्हें और कमजोर कर देता है। परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर चट्टानें खिसक जाती हैं। वहीं कम अवधि की बारिश अपेक्षाकृत छोटे भूस्खलनों को जन्म देती है।
मानसून के दौरान स्थिति सबसे ज्यादा संवेदनशील रहती है। जून से सितंबर के बीच 52 जानलेवा घटनाएं दर्ज की गईं। वर्ष 2017 में अकेले पांच घातक भूस्खलन सामने आए, जो हाल के वर्षों में सबसे अधिक हैं। यह प्रवृत्ति बताती है कि पहाड़ी क्षेत्रों में चरम वर्षा और भूगर्भीय अस्थिरता मिलकर खतरे को बढ़ा रही है।

चट्टानों के प्रकार का विश्लेषण भी अध्ययन का अहम हिस्सा रहा। नीस और क्वार्टजाइट चट्टानों वाले इलाकों में अधिक घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि लाइमस्टोन क्षेत्रों में भी कई हादसे सामने आए। यह शोध हाल ही में इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज के जर्नल ‘जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस’ में प्रकाशित हुआ है।
उत्तराखंड का इतिहास भी इन त्रासदियों का साक्षी रहा है। 1998 में पिथौरागढ़ जिले के मालपा में हुए भीषण भूस्खलन में 210 लोगों की मौत हो गई थी। 1880 में नैनीताल में 151 लोगों की जान गई थी। रुद्रप्रयाग और नीलकंठ क्षेत्र में भी सैकड़ों लोगों की मौत के मामले दर्ज हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जोखिम वाले इलाकों की विस्तृत मैपिंग, निर्माण कार्यों पर वैज्ञानिक नियंत्रण, प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम और वर्षा-भूजल की निगरानी ही इस बढ़ते खतरे को कम कर सकती है। पहाड़ों की यह चेतावनी स्पष्ट है—प्राकृतिक संतुलन से छेड़छाड़ और बदलते मौसम के दौर में सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है।




